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राधा के बिना अधूरे हैं कान्हा

अश्रुत पूर्वा विशेष II

श्रीकृष्ण को याद कीजिए तो राधा जी भी चली आती हैं। दोनों के बीच आज भी गहरा प्रेम है। यह शाश्वत है। हम कृष्ण से पहले राधा का ही नाम लेते हैं। उनके बिना कृष्ण की कल्पना नहीं। कितनी अजीब बात है कि जिस कान्हा पर संसार मोहित है, वे राधा पर मुग्ध रहते हैं। कुछ विद्वान राधा को काल्पनिक मानते हैं। मगर ऐसा नहीं है। सच तो यह है कि जहां गोपियां कृष्ण की 64 कलाओं का रूप हैं तो राधा उनकी महाशक्ति हैं।

दरअसल, कृष्ण की सभी शक्तियां इस धरती पर स्त्री रूप में या कहें कि गोपियों के रूप में अवतरित हुईं। पृथ्वी और प्रकृति को भी स्त्री रूप में ही देखा जाता है। स्त्री के सम्मान में ही आपकी बरकत है, इस दुनिया की बरकत है। स्त्री अलग-अलग रूपों में सामने आती है। कभी मां के रूप में तो कभी बहन के रूप में। जब वह पत्नी या प्रेमिका के रूप में या कभी मित्र बन कर आती है तो आपका दायित्व कम नहीं हो जाता। उसके स्वाभिमान और गरिमा का मान रखना उतना ही बड़ा आपका दायित्व है।

…एक सवाल प्राय: मन में उठता है कि अगर राधा से इतना ही प्रेम था तो कृष्ण उन्हें छोड़ कर क्यों चले गए। फिर कभी लौटे क्यों नहीं। क्यों टूट गई उनकी मित्रता। क्यों उन्हें और गोपियों को समझाने के लिए उद्धव जी को भेजना पड़ा। वैसे वे आंसू बहा कर मान भी जाती हैं। विरह का घूंट पी लेती हैं। मगर यहीं से वे और गोपियां भक्ति कासर्वोच्च मार्ग प्रशस्त करती हैं। राधा अपने एकनिष्ठ प्रेम का उदाहरण तो हैं ही भक्ति का ऐसा सहज माध्यम भी हैं कि उनका स्मरण करने भर से आप शोक-अवसाद से बाहर निकलने लगते हैं। आपका मन निर्मल होने लगता है।

कृष्ण ने बेशक रुकमिणी से विवाह किया। मगर राधा ने कभी एतराज नहीं जताया। इसके बाद कभी उनसे जुदा नहीं हुईं। वे कृष्ण के मन के एकांत में अखंड प्रेमधारा हैं जो सदियों से बहती हुई आपके मन तक चली आई हैं। विश्व साहित्य में जितनी प्रेम कविताएं और कहानियां लिखी गई हैं, वे कृष्ण और राधा के प्रेम के बिना अधूरी हैं। गर्ग संहिता में राधा के माधुर्य भाव का वर्णन मिलता है। यह संहिता गर्ग मुनि ने लिखी थी जो यदुवंशियों के कुलगुरु थे। इसलिए कहा जाता है कि राधा-कृष्ण का प्रेम चित्रण काल्पनिक नहीं है। यह उतना ही सत्य है जितना आपके मन में उमड़ा प्रेम भाव। राधा भाव, मैत्री का भाव।

  • श्रीकृष्ण वादे के पक्के माने जाते हैं। उन्होंने कहा था कि वे लौट कर आएंगे। मगर वे कभी नहीं आए राधा से मिलने। ऐसा क्यों हुआ। और फिर क्या हुआ था राधा का। यह सवाल हम सब के मन में उठता रहा है। कितने दिन, कितने महीने और कितने बरस बीत गए। यमुना किनारे बैठीं राधा बरसों बरस याद करती रहीं कान्हा को। … अब तो मुझे लगता है कि यमुना राधा के आंसू के रूप में आज भी बह रही है।

श्रीकृष्ण वादे के पक्के माने जाते हैं। उन्होंने कहा था कि वे लौट कर आएंगे। मगर वे कभी नहीं आए राधा से मिलने। ऐसा क्यों हुआ। और फिर क्या हुआ था राधा का। यह सवाल हम सब के मन में उठता रहा है। कितने दिन, कितने महीने और कितने बरस बीत गए। यमुना किनारे बैठीं राधा बरसों बरस याद करती रहीं कान्हा को। … अब तो मुझे लगता है कि यमुना राधा के आंसू के रूप में आज भी बह रही है। यह दुख सचमुच सालता है मुझे।

कहते हैं कि जब कृष्ण उन्हें छोड़ कर जा रहे थे तो राधा ने कहा था- आप भले ही मुझसे दूर जा रहे हैं। मगर आप मेरे मन में हमेशा रहेंगे। …और कृष्ण चले गए। हमेशा के लिए चले गए। मगर मन से तो कभी नहीं गए। वे अपना दिल राधा के पास ही छोड़ गए। उनके बीच अटूट प्रेम बचा रहा। दिव्य कृष्ण और उनकी अनन्य भक्त राधा के एकनिष्ठ प्रेम को समझना हो तो बारहवीं शताब्दी में जयदेव का लिखा गीतगोविंद अवश्य पढ़िए।

बरसों बाद श्रीकृष्ण द्वारिकाधीश बन गए। राधा अपने अंतिम दिनों में द्वारिका पहुंचीं। जब दोनों मिले तो शब्द गुम हो गए। दोनों निर्झर बहते नयनों से संवाद करते रहे। क्योंकि दोनों तो मन से जुड़े थे। मगर वहां पास रह कर वह सुख नहीं मिला जो वियोग में उन्हें कृष्ण को रूहानी रुप में पास पाकर महसूस होता था। कहते हैं कुछ समय कान्हा के पास रहने के बाद राधा लौट गईं। रास्ते में कुछ तय नहीं था कि वे अब कहां जाएंगी। वे अकेली महसूस कर रही थीं। अंतिम दिनों में वे बेहद कमजोर हो गई थीं।

इसके बाद कृष्ण ने अपना वादा निभाया। वे अचानक राधा के सामने आ गए। और पूछा- बोलो राधा, तुम्हें क्या चाहिए। मगर उनका जवाब था, तुमसे मुझे कुछ नहीं चाहिए। बार-बार कान्हा के पूछने पर राधा बस इतना ही बोलीं-आखिरी बार अपनी बांसुरी की वो धुन सुना दो कन्हैया। कृष्ण ने उनकी अंतिम इच्छा पूरी की। उन्होंने अपनी बांसुरी से राधा को वह धुन सुनाई जो उन्हें बेहद प्रिय थी। दोपहर से रात हो गई कृष्ण बांसुरी बजाते रहे। किंवदंती है कि इसके बाद राधा अपनी देह त्याग कर श्रीकृष्ण में सदा के लिए विलीन हो गईं। शोक में डूबे कृष्ण ने उसी वक्त बांसुरी तोड़ दी और उसे झाड़ियों में फेंक दिया। कहते हैं कि उसके बाद उन्होंने कभी बांसुरी नहीं बजाई। आखिर किसके लिए बजाते। प्रेम का समापन जो हो चुका था।

यही है प्रेम। अपने प्रिय के मन में विलीन हो जाना ही सच्चा प्रेम है। प्रिय से कुछ मत मांगिए। जैसे राधा ने कान्हा से कुछ नहीं मांगा और न कान्हा ने राधा से। यही है प्रेम की पावनता जो बिरलों को नसीब होती है। प्रेम भोग में नहीं, वियोग में है। कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मणी को ऐश्वर्य का सुख निसंदेह दिया मगर अलौकिक प्रेम का सुख सिर्फ राधा को मिला। ऐसे प्रेम को साधने की शक्ति होनी चाहिए। राधा और कृष्ण आपके मन में ही हैं। हर मन प्रेममय हो, हर मन राधामय हो, हर मन कृष्णमय हो, आज यही मंगलकामना।
(तस्वीर- गूगल से साभार)

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Ashrut Purva

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