कविताएं काव्य कौमुदी

महादेवी-महादेव

चित्र: साभार गूगल

प्रेमशंकर शुक्ल II

शिव फूल रचते हैं
और गौरा सुगन्ध भरती हैं

गौरा गीत गाती हैं
और ताल देते हैं शिव

जीवन के राग सिरजती हैं महागौरी
और कर्पूरगौर अनवरत सहेजते हैं करुणा

दुनियादारी को बूझते हैं महादेव
और महादेवी चीन्ह लेती हैं :
गूढ़ से गूढ़ चालाकियाँ

सृष्टि का पहला प्रेम और दाम्पत्य हैं उमा-महेश
गझिन बुनते हुए परस्परता
उदात्त को किए हुए असीम-अथाह

प्रेम ने यहीं पूर्णता पाई
विवाह, परिवार का यहीं से हुआ श्रीगणेश
विकसित है यहीं
सम्पूर्णानन्द !
आद्या-आशुतोष के घर में ही है यह :
कि मिली हुई है पूरम्पूर
जगत को जगह

‘ असमाप्त आरम्भ ‘ से

About the author

प्रेम शंकर शुक्ल

16 मार्च 1967 रीवा,मध्य प्रदेश के गाँव -गौरी (सुकुलान ) में जन्म।
बहुकला केंद्र , भारत भवन की आलोचना पत्रिका 'पूर्वग्रह' के संपादक ।
वर्तमान में भारत भवन ,भोपाल में मुख्य प्रशासनिक अधिकारी ।
'कुछ आकाश ',झील एक नाव है ', 'पृथ्वी पानी का देश है ','भीम बैठका एकांत की कविता है' , जन्म से ही जीवित है पृथ्वी' ,नाम से पाँच कविता संग्रह प्रकाशित । रज़ा सम्मान, दुष्यंत कुमार स्मृति सम्मान ,नवीन सागर सम्मान एवं अन्य प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित ।

Leave a Comment

error: Content is protected !!