प्रेमशंकर शुक्ल II
शिव फूल रचते हैं
और गौरा सुगन्ध भरती हैं
गौरा गीत गाती हैं
और ताल देते हैं शिव
जीवन के राग सिरजती हैं महागौरी
और कर्पूरगौर अनवरत सहेजते हैं करुणा
दुनियादारी को बूझते हैं महादेव
और महादेवी चीन्ह लेती हैं :
गूढ़ से गूढ़ चालाकियाँ
सृष्टि का पहला प्रेम और दाम्पत्य हैं उमा-महेश
गझिन बुनते हुए परस्परता
उदात्त को किए हुए असीम-अथाह
प्रेम ने यहीं पूर्णता पाई
विवाह, परिवार का यहीं से हुआ श्रीगणेश
विकसित है यहीं
सम्पूर्णानन्द !
आद्या-आशुतोष के घर में ही है यह :
कि मिली हुई है पूरम्पूर
जगत को जगह
‘ असमाप्त आरम्भ ‘ से

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