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भाषा देशों को जोड़ने का भी माध्यम : जयशंकर

अश्रुतपूर्वा II

नई दिल्ली। फिजी में विश्व हिंदी सम्मेलन आरंभ हो चुका है। सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भाषा न केवल पहचान की अभिव्यक्ति है बल्कि भारत और दूसरे देशों को जोड़ने का माध्यम भी है। प्रमुख शहर नांदी में फिजी सरकार और भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में दुनिया भर से हिंदी के करीब 1,200 विद्वान और लेखक हिस्सा ले रहे हैं।
सम्मेलन में जयशंकर ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में पुनसंर्तुलन हो रहा है। वह युग पीछे छूट गया है जब प्रगति का मानक पश्चिम को माना जाता था। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में धीरे-धीरे व्यापक बहु-ध्रुवीयता उत्पन्न हो रही है और अगर तेजी से विकास करना है तो यह आवश्यक है कि सांस्कृतिक पुनसंर्तुलन भी हो। विश्व हिंदी सम्मेलन देनाराउ कनवेंशन सेंटर में तीन दिन चलेगा। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में  फिजी के राष्ट्रपति रातू विलीमे कटोनिवेरी के अलावा भारत के गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा, विदेश राज्यमंत्री वी मुरलीधरन भी मौजूद थे। इस मौके पर जयशंकर और कटोनिवेरी ने एक डाक टिकट भी जारी किया।
विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा, ज्यादातर देशों ने पिछले 75 साल में स्वतंत्रता हासिल की और यह उसका ही परिणाम है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में एक पुनसंर्तुलन हो रहा है। अगर तेजी से विकास करना है तो यह आवश्यक है कि सांस्कृतिक पुनसंर्तुलन भी हो। जयशंकर ने कहा, वह युग पीछे छूट गया है जब प्रगति का मानक पश्मिीकरण को माना जाता था। जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भाषा और संस्कृति के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, भारत ने आजादी के 75 वर्ष पूरे कर लिए हैं। अब हम अगले 25 वर्ष के लिए एक महत्वाकांक्षी पथ पर आगे बढ़ रहे हैं जिसे हमने अमृतकाल कहा है।
हिंदी के प्रसार पर जोर देते हुए जयशंकर ने कहा कि ऐसी कई भाषाएं और परंपराएं जो औपनिवेशिक दौर में दबा दी गई थीं, अब एक बार फिर वैश्विक मंच पर उभर रही हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि विश्व को सभी संस्कृतियों और समाजों के बारे में अच्छी जानकारी हो और इसी लिए हिंदी सहित विभिन्न भाषाओं के शिक्षण और प्रयोग को व्यापक बनाना बहुत जरूरी है। उद्घाटन समारोह को राष्ट्रपति कटोनिवेरी के अलावा अजय मिश्रा एवं वी मुरलीधर ने भी संबोधित किया। (यह प्रस्तुति मीडिया में आए समाचार पर आधारित)

विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि ऐसी कई भााषाएं और परंपराएं जो औपनिवेशिक दौर में दबा दी गई थीं, अब एक बार फिर वैश्विक मंच पर उभर रही हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि विश्व को सभी संस्कृतियों और समाजों के बारे में अच्छी जानकारी हो और इसी लिए हिंदी सहित विभिन्न भाषाओं के शिक्षण और प्रयोग को व्यापक बनाना बहुत जरूरी है।

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