प्रो. सदानन्द शाही II
आजकल श्रद्धा हत्याकांड चर्चा में है। प्रेमी ने साथ रह रही श्रद्धा की हत्या की और उसकी लाश के 35 टुकड़े कर के बड़े फ्रिज में रखकर ठिकाने लगाता रहा। निर्भया कांड के बाद यह सबसे हृदय विदारक हत्याकांडों में से एक है।फ़र्क़ इतना है कि निर्भया कांड के बाद एक देशव्यापी उद्वेलन पैदा हुआ था। दिल्ली से लेकर बनारस तक धरना प्रदर्शन हुए थे, विरोध और एकजुटता में मोमबत्तियाँ जलाई गईं थीं।टेलीविज़न के चैनल आग उगल रहे थे। अख़बारों में लेख छप रहे थे, बहुतेरे क़ानून बने थे और लगा था कि अब स्त्री के प्रति हिंसा रुक जायेगी। लेकिन यह एक सदिच्छा ही बन कर रह गयी। निर्भया हत्या कांड के समय भी लिखते विचारते समय इन पंक्तियों के लेखक का मानना था कि सिर्फ़ क़ानून से ऐसे जघन्य अपराध नहीं रोके जा सकेंगे।इसके लिए एक उदात्त और मानवीय समाज का निर्माण ज़रूरी है और ज़रूरी है स्त्री के प्रति सहज मानवीय और बराबरी का भाव। यों तो हमारे समाज में पहले से भी और आज भी महिला सम्मान को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की जाती रही हैं । लेकिन ठहरकर देखें तो असलियत एकदम उलट है। इसे समझने के लिए श्रद्धा हत्या कांड पर विभिन्न हिस्सों से आ रही प्रतिक्रियाओं पर विचार कर लेना चाहिए ।समाचार माध्यमों की बात नहीं करूँगा क्योंकि वे इस घटना को संवेदनशीलता की सीमा से बाहर जाकर धार्मिक पहलू से देखने दिखाने की कोशिश में लगे हुए हैं। लैंगिक पूर्वाग्रहों के नाते हो रही हत्याएं उनके लिए टीआरपी बढ़ाने की सत्य कथाएँ बनकर रह गयी हैं ।ऐसे भयावह समय में हमें लैंगिक पूर्वाग्रहों की सामाजिक भूमिका पर विचार करना चाहिए ।
‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता’ का गान करते हम नहीं अघाते हैं, हमारे कवि नारी तुम केवल श्रद्धा हो कहते चले आ रहे हैं और हक़ीक़त यह कि हम श्रद्धा की विदाई का शोकगीत लिखने के लिए अभिशप्त हैं।
प्रो. सदानंद शाही, कुलपति
शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, भिलाई

वे कौन से सामाजिक कारण हैं जिनसे लैंगिक हिंसा वाली घटनाएँ घटती हैं, इसे समझने के लिए वाट्सएप पर हाल में मिले एक चुटकुले से बात शुरू करते हैं। चुटकुला भेजने वाले काफ़ी पढ़े लिखे, शास्त्रज्ञ और सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। वे वाट्सएप से प्राय: सद्विचार भेजते रहते हैं। उन्होंने जो चुटकुला भेजा वह कुछ इस प्रकार है- मेरे पड़ोसी के घर में रोज़ उसकी पत्नी झगड़ा करती थी… आज ही उसका पति बड़ा सा फ्रिज लाया है । तब से उसकी पत्नी गुमसुम और चुप्पी साधे बैठी है । इसके बाद एक आँख दबाकर जीभ निकाले दो ईमोजी भी है।यानी यह हास्य का एक बेहतरीन अवसर है ।
मुझे हैरानी हुई कि इतना पढ़ा लिखा सुसंस्कृत व्यक्ति भला ऐसे जघन्य हत्याकांड से हास्य पैदा करने की कोशिश कैसे कर सकता है? संभव है चुटकुला उन्होंने न बनाया हो, पर भेजा तो है। इस चुटकुले के पीछे एक भयंकर क़िस्म की संवेदनहीनता तो है ही घनघोर लैंगिक पूर्वाग्रह भी है।और है पूर्वाग्रह से उपजा यह सरलीकरण कि पत्नियाँ प्राय: झगड़ती रहती हैं और इस झगड़े का निदान सिर्फ़और सिर्फ़ पिटाई है। स्त्रियाँ बिना पिटाई के नियंन्त्रण में नहीं रहतीं, सदाचरण नहीं बरततीं आदि-आदि।यदि हम स्त्री-पुरुष और पति पत्नी पर बनने वाले अन्य चुटकुलों का विश्लेषण करें तो पायेंगे कि अधिकांश के मूल में लैंगिक पूर्वाग्रह से उपजा यह सरलीकरण ही काम कर रहा होता है।
यह चुटकुला श्रद्धा हत्याकांड के बारे में अनायास ही एक धारणा बना रहा है। श्रद्धा अपने प्रेमी से लगातार झगड़ती रही होगी इसलिए आजिज़ आकर प्रेमी ने उसकी हत्या कर दी होगी। झगड़ने की सजा हत्या हो सकती है इसे उचित मान कर ही यह चुटकुला जन्म लेता है।इतनी जघन्य हत्या को मानसिक तौर पर उद्वेलित हुए बिना बर्दाश्त कर लेने की सलाहियत समाज को ऐसे ही पूर्वाग्रहों से ही मिलती है।
समाज में एक तरह की नैतिक पुलिसिंग की अन्तरधारा भी प्रवाहित होती रहती है। जब ऐसी जघन्य घटनाएँ घटती हैं तो यह धारा विविध रूपों में प्रकट हो जाती है।फुसफुसाहटें गूंजने लगती हैं।बताओ भला! लड़की होकर बिना माता-पिता की अनुमति के घर से बाहर निकल गयी, विजातीय लड़के के साथ चली गयी, विवाह कर लिया यह तो होना ही था, फल मिल गया आदि- आदि। विवाह की तो फिर भी माफ़ी मिल जाती है यह तो ‘लिवइन’ में थी। दइया रे दइया! लो अब भुगतो पर जाकर बात ख़त्म होती है ।यह नैतिक पुलिसिंग एक तरह की (अ)न्यायपालिका में बदल जाती है, जो बिना किसी जाँच परख के घटना पर एकतरफ़ा फ़ैसला देती है, जो अन्याय अत्याचार का शिकार है उसे ही दोषी करार दे दिया जाता है। याद कीजिए निर्भया के समय में भी आख़िर इतनी रात वह गयी क्यों थी, क्या माता पिता से पूछ कर गयी थी, माता पिता ने पढ़ने के लिए भेजा था या कि गुलछर्रे उड़ाने के लिए, जैसी अनेक बातें हो रही थीं। अनायास ही सारा दोष भुक्तभोगी पर मढ़ दिया गया या कि मढ़ दिया जाता है। यह लैंगिक पूर्वाग्रह इतना पुरज़ोर है कि पढ़ाई लिखाई ज्ञान मीमांसा साहब बेमानी हो जाता है।
शुचितावादी दृष्टि की एक अलग समस्या है। यह प्रेम को भी हिंसक बना देती है। प्रेम न भरोसा कर पा रहा है और न ही भरोसा दे पा रहा है, बल्कि संदेह के गहन अंधकार में ढकेल दे रहा है। प्रेमी या पति की जो बाँहें भरोसे की सबसे खूबसूरत जगह होनी थीं वे ही गला घोंटने पर आमादा हैं। प्रेमिका या पत्नी का फ़ोन उठ नहीं रहा है या फिर देर तक व्यस्त आ रहा है, यह भी हत्या का कारण बन जाता है। अरे भाई इतना संदेह है तो मनोचिकित्सक से मिलो इलाज कराओ।
इसी तरह मर्दानगी एक दूसरे तरह की समस्या है। मर्दानगी का गुप्त रोग जाने कब से हमारे समाज में नासूर सा पल-बढ़ रहा है- तुम हमें चाहो न चाहो कोई बात नहीं, किसी और को चाहोगे तो मुश्किल होगी। यह मुश्किल हत्या तक चली जाती है। पहले फ़िल्मों में हमने सुना कि नायक नहीं, खलनायक हूँ मैं, अब समाज में चहुँ ओर खलनायक नायक का मुखौटा पहने बैठ गया है। जो अपनी प्रेमिकाओं की हत्या कर रहे हैं, कभी वे भी नायक बनकर उनके जीवन में दाखिल हुए होंगे और ज़रा सी बात पर हत्यारे बन बैठे। मर्दानगी का यह रोग बार बार हमारी मनुष्यता का क्षरण करता है।
प्रतिष्ठा एक और समस्या है, कभी दहेज को लेकर तो कभी परिवार की नाक को लेकर महिलाएँ बलि चढ़ाई जा रही हैं। स्त्री सम्मान को लेकर हम अपनी पीठ जितना थपथपा लें सच बात यह है कि हम ऐसा समाज बना पाने में असफल रहे हैं जिसमें स्त्री निर्भय होकर घूम सके।
यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता का गान करते हम नहीं अघाते हैं, हमारे कवि नारी तुम केवल श्रद्धा हो कहते चले आ रहे हैं और हक़ीक़त यह है कि हम श्रद्धा की विदाई का शोकगीत लिखने के लिए अभिशप्त हैं। हम लैंगिक पूर्वाग्रहों के ऐसे गिरफ्तार हो गये हैं कि मनुष्यता की बुनियादी शर्तों पर भी खरे नहीं उतर पा रहे हैंकुछ दिन पहले मुझसे मिलने मारीशस की एक शोधार्थी आई थी। बातों बातों में मैंने पूछ लिया कि यहाँ किसी से दोस्ती हुई क्या? उसने संकोच पूर्वक कहा नहीं? क्यों के उत्तर में उसने बताया कि मेरे पिता ने कहा था वहाँ जा रही हो तो किसी को पसंद मत करना, वहाँ बहुएँ जला दी जाती हैं । सन 2000 में जब मैं पहली बार मारीशस गया था मुझे एक अध्यापिका मिली थीं उन्होंने भी कुछ ऐसी ही बातें कही थीं ।मारीशस जो हमारा अपना है वहाँ हमारी यह छवि बनी है। क्या हम इस छवि को बदलने को तैयार हैं?
8 दिसम्बर के हिन्दी दैनिक ‘हिंदुस्तान’ में प्रकाशित
