आलेख/धारावाहिक नाटक/उपन्यास KathAyam

गणेश अर्थात ‘आत्मबोध का भाव’

डाॅ. यशोधरा शर्मा II

ढोल ‘नगाड़े बजाते,चंदन गुलाल उड़ाते हर एक घर में प्रस्थापित हो जाएगें आज श्री गणेश।

‘गणेश’ का अर्थ होता है ‘आत्मबोध’ अर्थात स्वयं को जानने का भाव। एक और अर्थ भी है इसका ‘गणों का समूह’। इनको आधार मान कर समझा जाए तो गणों का अर्थ  होता है विभिन्न प्रकार की ऊर्जा और गुण,अर्थात ‘स्व’ के ज्ञान और ऊर्जा के साथ  जीवन की बाधाओं को पार करते हुए जीता है वह ‘गणेश’ है । यही तो हम सभी के जीवन को व्यवस्थित करने की सीख है,क्योंकी स्वयं को साधे समझे बिना जीवन दिशाहीन हो जाता है।

शिव का स्वरूप यदि कल्याणकारी है तो गणेश विघ्नहर्त्ता हैं । इनका  बाह्यरूप भी प्रेरणादायक है। लंबी सूँड सिखाती है कि हम जीवन में आने वाले दुर्लभ अवसरों को पहले से ही पहचान लें,वर्तमान ही नही भावी जीवन के लिए सचेत रहें। लंबे कान सिखाते हैं कि हमें दूसरों की बात धैर्य से सुननी चाहिए । सूक्ष्म आँखे कहतीं हैं कि जीवन में सूक्ष्म लेकिन तीक्ष्ण दृष्टि रखनी चाहिए। चूहे जैसा छोटे वाहन रखने वाले गणपति समझातें हैं कि दिखावे की संस्कृति के जाल में न फँसकर जिंदगी सरल और सहज ढंग से बितानी चाहिए। मोदक का अर्थ है ‘मोद’ खुशी और ‘क’ छोटा सा भाग,इनका प्रिय भोज्य मोदक सिखाता है, हर पल को खुशी से जीएं, आनन्द का छोटा सा पल भी अनमोल है। इनका मोदक भी विशेष होता है। चावल के आटे में चीनी ,नारियल, खोया आदि मिला कर भाप मे बनते हैं।

  • ‘विभिन्न प्रकार की ऊर्जा और गुण, अर्थात ‘स्व’ के ज्ञान और ऊर्जा के साथ  जीवन की बाधाओं को पार करते हुए जीता है वह ‘गणेश’ है ।’

गणपति बप्पा मोरिया  के स्वर चारों ओर गूँजते है। इस जयकारे की कथा का उदगम महाराष्ट्र का चिंचवाड गाँव है । यहाँ एक संत थे  ‘मोरवा गोसावी’,गणेश जी के परम भक्त।गणेश चतुर्थी के दिन कई किलोमीटर पैदल चल कर गणेश दर्शन को जाते थे। यह क्रम 117 वर्ष चला।अधिक उम्र होने पर उनका क्रम टूटने लगा।स्वप्न दर्शन में कहा गया एक मूर्ति नदी में मिलेगी और वैसा ही हुआ। लोग संन्यासी जी के चरण स्पर्श करके उनको ‘मोरया” कहने लगे। मोरया भी अपने भक्तों को मंगल मूर्ति पुकारने लगे।

आपसी मेल जोल और रिश्तों की डोर को सुदृढ करने का प्रतीक है यह गणेशोत्सव। स्वतंत्रता आंदोलन के समय बाल गंगाधर तिलक ने समाज में समरसता बढाने के लिए गणेश उत्सव को सार्वजनिक रूप से मनाने की परंम्परा चलाई थी, जिससे कि आम लोगों की इस उत्सव के साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी हो सके।

अपना भारत पर्व और उत्सवों का देश है।  प्रत्येक पर्व महापुरुषों और देवी देवताओं से सम्बन्धित है सभी महापुरुषों और देवी देवताओं के आदर्शों को हम सभी अपने जीवन मे अपनाएं यही उनकी सच्ची आराधना होगी।

गणपति से माता पिता की सच्ची भक्ति, बुद्धिमानी, और सबका दुख दूर करने की शिक्षा मिलती है गणपति की जयकार करते हुए उनके प्रिय भोजन मोदक का प्रसाद ग्रहण करे। श्री गणेश सभी के कष्ट दूर करें जय श्री गणेश ।

About the author

डॉ यशोधरा शर्मा

जन्म: ऐतिहासिक नगरी, आगरा

शिक्षा: एम.ए.,पी.एच.डी., हिन्दी साहित्य विषय

अभिरूचियाँ : लेखन, पठन, शास्त्रीय संगीत विशेषकर नृत्य, पाक, कला, बागवानी, गृह सज्जा

संप्रति : शिक्षिका पद से निवृत्त होकर बैंगलुरू में साहित्य सेवा

सम्पर्क: शान्ति निकेतन, व्हाइट फील्ड, बैंगलुरू।

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