प्रिया वर्मा II
एक कहती बड़ा गीला मन है तुम्हारा
एक कहती अपने लिए वक़्त निकालो
एक कहती कहीं भाग क्यों नहीं जातीं!
एक पूछती जिसके साथ बंधी हो क्या वह बंधा है ?
इतने में सबसे पीछे से उठती आवाज़
कैसे रहती हो बिना दिखे बिना देखे
बोलती हो, बिना बात किए
कहना भूल क्यों जाती हो!
पागल क्यों नहीं हो जाती हो!
दीवारों से वर्षों तक कैसे कर लेती हो संवाद?
जो मैं होती इस जगह….! (तो?)
तो…….
(अब अनुगूंज एक स्त्री में बदल गई है)
(स्त्री के जीवन में आई स्त्रियों में एक स्त्री और बढ़ गई है)
स्त्री के जीवन में आई स्त्रियाँ एक दूसरे की पीठ सहलाती हैं
जानती हैं कि उनकी माँएं एक-सी दुनिया में पैदा हुईं
दोनों टाँगों को बारी-बारी उघाड़कर कहतीं
ये टाँग खोलो तब भी हम नँगे, ये टाँग खोलो तब भी
तो ढाँपे रहो और फैलती रहो भग्न अम्बर में अमरबेल लाल मिर्च आँगन में सूखने को डालो
और खुद सीलती रहो
खोजती रहो कि कोई जड़ी
वशीकरण की
एक आत्मीय स्पर्श की खातिर
स्त्रियों के जीवन में उतर रही हैं स्त्रियाँ
देह के प्रेम में लिंग का स्थान योनियों ने ले लिया
दुनिया एकसाथ सिकुड़ रही है एकसाथ बड़ी हो रही है
दुनिया फैलती जा रही है- और इतनी छोटी भी कि
इस छोर से उस छोर तक अब रोती नहीं।
बदल जाती है। चली जाती है दुनिया में से आधी दुनिया
या रात भर को ठहर जाती है किसी स्त्री की कहानी में।
