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आशंकाओं का दिसंबर और उम्मीदों की जनवरी

फोटो : साभार गूगल

डॉ. एके अरुण II

कोरोना संक्रमण की दहशत को अब दो साल हो चले है। वर्ष 2020 के अंत और 2021 के आरंभ में स्थिति कुछ थमती, तभी कोरोना की दूसरी लहर ने हालात बेकाबू कर दिए थे। अप्रैल 2021 में देश इस संक्रमण की वजह से मौत का तांडव झेल रहा था। लोग सहमे हुए थे। सरकारी और निजी अस्पताल मरीजों से पटे थे। श्मशान और कब्रगाहों तक में लोगों की कतारें थीं। बीते सौ बरस में देश ने महामारी से मौत का ऐसा मंजर नहीं देखा। लाखों परिवार उजड़ गए। करोड़ों लोगों की नौकरियां छिन गई । महंगाई चरम पर पहुंच गई। इलाज के नाम पर लोग लूटे जा रहे थे, सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार में लिप्त था।  

साल 2021 के अंत तक उम्मीद की जा रही थी कि स्थिति सुधरने लगेगी लेकिन तभी कोरोना संक्रमण ओमिक्रान की तीसरी लहर के आतंक ने भारत ही नहीं फिर से पूरी दुनिया में दहशत का माहौल बना दिया। कई राज्यों में लोगों के सामान्य जीवन पर सरकारी पाबंदियों की घोषणा हो चुकी है। महीनों से घरों में कैद लोगों ने क्रिसमस के बहाने जो खुशियां तलाशी थीं उन पर विराम के बादल मंडरा रहे हैं। कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामले से न केवल आम लोगों में खौफ है बल्कि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञों के भी हाथ-पांव फूलने लगे हैं।

देश में लगभग 120 करोड़ लोगों में टीकाकरण के दावे किए जा रहे हैं। सरकारी विज्ञापनों की मानें तो सौ करोड़ से ज्यादा लोगों ने कोरोना संक्रमण से बचाव की खुराक (वैक्सीन) लगवा ली है फिर भी कोई इस महामारी से बचाव के लिए आश्वस्त नहीं है। महानगरों को छोड़ दें तो गांवों, छोटे शहरों और आम लोगों में महामारी से बचाव के एहतियात को लेकर अब भी कोई खास जागरूकता नजर नहीं आ रही। शादी, त्योहार, चुनावी रैलियां, जलसे आदि में लोगों की भारी भीड़ इस बात की गवाह है। लेकिन सच तो यह है कि संकट पहले की तरह कायम है। 

हमारे सामने अब 2022 खड़ा है। देश के लोगों को समझ में नहीं आ रहा कि हम इसका स्वागत करें या अपनी तकदीर पर आंसू बहाए? आम लोगों पर महंगाई की मार है, महामारी का आतंक है और असुरक्षा का माहौल है। फिर भी देश के लोग जीवट हैं जो कभी उम्मीद नहीं छोड़ते। हिंदुस्तान के लोग भीषण त्रासदी से भी गुजर कर हौसला नहीं छोड़ते। इतिहास हवाह है। आशंकाओं का दिसंबर बीत रहा है तो उम्मीद की जनवरी सामने है। आइए हौसला रखें और नए वर्ष 2022 का स्वागत करें। चाहे लाख मुसीबत हो, बहारें फिर भी आएंगी।

मौत का तांडव कभी भी शुरू हो सकता है। अभी नवंबर में ही जब चिकित्सा वैज्ञानिकों ने दक्षिण अफ्रीका के बोत्सवाना में एक नए प्रकार के कोरोनावायरस का सैम्पल देखा तो दुनिया में इस संक्रमण के तीसरी लहर की आशंका तेज हो गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस स्वरूप को बी.1.1.529 यानी ओमिक्रान का नाम दिया है। चिंता की बात यह है कि दिसंबर के अंत तक कोरोना का यह स्वरूप भारत सहित 70 से ज्यादा देशों में पहुंच चुका है।

कोरोना संक्रमण की विडंबना यह है कि हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इस विषाणु के सैकड़ों हिस्से को तो पहचान सकता है लेकिन दूसरे छह ऐसे हिस्से हैं जो संक्रमण रोकने में महत्त्वपूर्ण होते हैं और प्रोटीन में होते हैं। ये स्पाइक प्रोटीन कोशिका से वायरस को चिपकाने में मदद करते हैं। खतरा यह है कि यदि वायरस के इस नए स्वरूप के स्पाइक में बदलाव आ गया तो हमारा इम्यून सिस्टम वायरस को नहीं पहचान पाएगा और टीकाकरण के बावजूद संक्रमण का खतरा बना रहेगा। ओमिक्रॉन को लेकर जो दहशत है, वह गैरवाजिब नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इससे चिंतित है। 

अभी तक इस वेरियन्ट के 30 से ज्यादा म्यूटेशन हो चुके हैं और यह इम्यूटेशन स्पाइक प्रोटीन क्षेत्र में हुए हैं जो बेहद चिंताजनक हैं। यदि ओमिक्रॉन का बदलाव खतरनाक हुआ तो टीके लगने के बावजूद संक्रमण की तबाही मच सकती है। ऐसे में कोरोना से बचाव के अब तक उपलब्ध सभी टीकों की समीक्षा करनी पड़ेगी। इस वेरियेन्ट के साथ एक दिक्कत और हो सकती है कि इसका पता लगाने के लिए सामान्य आरटीपीसीआर जांच की जगह जिनोम सिक्वेसिंग तक का सहारा लेना पड़ सकता है।

कोरोना संक्रमण के लगभग 20 महीने के अनुभव के बावजूद हमारा सरकारी स्वास्थ्य तंत्र भरोसे लायक नहीं बन पाया है। सरकारी दावे के अनुसार कोरोना से बचाव के नाम पर कोई 30 लाख करोड़ से भी ज्यादा रकम खर्च की जा चुकी है लेकिन फिर भी हम इस आशंका से उबर नहीं पा रहे कि स्वास्थ्य की आपात स्थिति में हमारे नागरिक समुचित स्वास्थ्य सेवा सहज प्राप्त कर पाएंगे।

लेखक जन स्वास्थ्य वैज्ञानिक एवं राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होमियोपैथिक चिकित्सक हैं। 

About the author

AK Arun

डॉ. एके अरुण देश के प्रख्यात जन स्वास्थ्य विज्ञानी हैं। वे कई पुस्तकों के लेखक और संपादक हैं। साथ ही परोपकारी चिकित्सक भी। वे स्वयंसेवी संगठन ‘हील’ के माध्यम से असहाय मरीजों का निशुल्क उपचार कर रहे हैं। डॉ. अरुण जटिल रोगों का कुशलता से उपचार करते हैं। पिछले 31 साल में उन्होंने हजारों मरीजों का उपचार किया है। यह सिलसिला आज भी जारी है। कोरोना काल में उन्होंने सैकड़ों मरीजों की जान बचाई है।
संप्रति- डॉ. अरुण दिल्ली होम्योपैथी बोर्ड के उपाध्यक्ष हैं।

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