सूफिया ज़ैदी II इधर पड़े हैं खंजर तो आरी कहाँ है,वतन की खातिर अब ज़िम्मेदारी कहाँ है। फैला है इस.कदर...
ग़ज़ल/गीत
देश के पत्रकार
मृदुला घई II इस देश के पत्रकार हैं हमनव युग के चित्रकार हैं हमनये दौर के आगाज़ हैं हमहर इन्सान की...
एक ग़ज़ल …..
अंजुम बदायुनी II मशीख़तों को फ़रोग़ देना नहीं है हुस्ने – विक़ार मेरान इतनी हल्की...
हमारी आदिवासी देह
प्रेम शंकर शुक्ल II सुन्दरता का रियाज कम हो गया है इसीलिए कुरूपता फैल रही है चहुँफेर। सुन्दरता के...
अनीस ‘मेरठी’ जी की तीन ग़ज़लें
अनीस ‘मेरठी’ II ..जब शबे फुरक़त किसी की मुन्तज़िर होती है आँख ,तब खुले दर से लिपट कर...
