अश्रुतपूर्वा II
नई दिल्ली। बुकर पुरस्कार से सम्मानित उपन्यास ‘रेत समाधि’ का अंग्रेजी में अनुवाद करने वालीं डेजी रॉकवेल ने कहा कि महिलाओं की कहानियों में रिश्तों की भावनाओं का अनुवाद करना सबसे मुश्किल होता है क्योंकि उनके रिश्ते परिवारों के अंदर ज्यादा गहराई से जुड़े होते हैं। वे जयपुर साहित्य उत्सव में बोल रही थीं। आपको बता दें कि डेजी ‘रेत समाधि’ का अनुवाद करने से पहले उपेंद्र नाथ अश्क के ‘गिरती दीवारें’, भीष्म साहनी के ‘तमस’ और कृष्णा सोबती के ‘गुजरात पाकिस्तान से, गुजरात हिंदुस्तान तक’ उपन्यास का अनुवाद कर चुकी हैं। ‘रेत समाधि’ गीतांजलि श्री का इन दिनों चर्चित उपन्यास है।
डेजी ने कहा, रिश्तों की भावनाओं का अनुवाद करना बड़ी चुनौतियों में से एक है। पुरुषों की लेखनी के मुकाबले महिलाओं की लेखनी में यह बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा, मैंने केवल महिलाओं की किताबों का अनुवाद करने का फैसला करने से पहले पुरुषों की तीन-चार किताबों का भी अनुवाद किया है।
अमेरिकी अनुवादक ने यहां जयपुर साहित्य उत्सव के पहले दिन बातचीत में कहा, मुझे सबसे बड़ी चुनौती रिश्तों की भावनाओं से निपटने में आई। क्योंकि महिलाओं की कथाओं में रिश्ते परिवार के अंदर ज्यादा गहराई से जुड़े होते हैं। उन्होंने कहा, आपको यह देखना होता है कि परिवार, रिश्ते और संबद्धता के रंग न बिखरे। इसलिए मैं अक्सर हर रिश्ते को एक नाम दे देती हूं तो मैं इसे बहू, बड़े और बेटी जैसे नाम देती हूं ताकि उनका किरदार नामों की तरह हो।
उपन्यास ‘रेत समाधि’ एक वृद्ध महिला की कहानी है जो पति की मौत के बाद गहरे अवसाद में चली गई है। गीतांजलि श्री की महिलाओं के संबंधों के साथ आत्मीयता 2000 में आए उनके उपन्यास ‘माई’ के साथ से ही जुड़ी है जिसे 2001 में क्रॉसवर्ड बुक अवार्ड के लिए चुना गया था। ‘माई’ का जिक्र करते हुए श्री ने कहा है कि एक महिला को यह साबित करने के लिए अपने घर से बाहर निकलने की जरूरत नहीं है कि वह ताकतवर है। (यह खबर मीडिया में आए समाचार पर आधारित)
