अश्रुतपूर्वा II
नई दिल्ली। हिंदी के विख्यात आलोचक मैनेजर पांडेय नहीं रहे। वे 82 साल के थे। उन्होंने दिल्ली में आंखिरी सांस ली। उनके निधन का समाचार मिलते ही हिंदी साहित्य जगत में शोक छा गया। कई लेखकों-कवियों और उनके विद्यार्थियों में उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनके चले जाने से हिंदी साहित्य की अपूरणीय क्षति हुई है। श्री पांडेय हिंदी में मार्क्सवादी आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर थे।
मैनेजर पांडेय गंभीर और विचारोत्तेजक आलोचना के लिए जाने जाते थे। उनका जन्म बिहार के गोपालगंज जिले के गांव लोहटी में 23 सितंबर 1941 में हुआ था। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की। पांडेय जवाहर लाल नेहरू विश्वद्यिालय के भारतीय भाषा केंद्र के प्रोफेसर थे। बाद में वे भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष भी बने।
मैनेजर पांडेय गंभीर और विचारोत्तेजक आलोचना के लिए जाने जाते थे। उनका जन्म गोपालगंज जिले के गांव लोहटी में 23 सितंबर 1941 में हुआ था। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की। पांडेय जवाहर लाल नेहरू विश्वद्यिालय के भारतीय भाषा केंद्र के प्रोफेसर थे। बाद में वे भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष भी बने।
मैनेजर पांडेय ने इससे पहले बरेली कालेज में भी पढ़ाया। जोधपुर विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे। उन्होंने सामाजिक आर्थिक बदलाव के आलोक में हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना को देखा। साहित्य में अहम योगदान के लिए पांडेय को कई सम्मान मिले। इनमें हिंदी अकादमी का शलाका सम्मान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा का सुब्रह्मयम सम्मान, रामचंद्र शुक्ल शोध संस्थान का गोकुल चंद्र पुरस्कार के अलावा राष्ट्रीय दिनकर सम्मान प्रमुख हैं।
मैनेजर पांडेय ने कई पुस्तकें लिखीं। इन्हें हिंदी साहित्य का संदर्भ ग्रंथ माना जाता है। इनमें प्रमुख हैं-साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका, आलोचना की सामाजिकता, साहित्य और इतिहास दृष्टि, भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य, हिंदी कविता का अतीत और वर्तमान, आलोचना में सहमति-असहमति।
