सांत्वना श्रीकांत II घूंघट ढेंप लेता हैऔरतों का आसमान,चांद जिसकी उपमेयबनने की ख्वाहिश में थी,वो छिप...
कविताएं
बंद किताबें
प्रणय कुमार II जब किताबेंबंद रहती होंगी वर्षों सेतब अंदरखाने मेंक्या कुछ होता होगा ?क्या लड़ते...
नफ़रत-“प्यार’ शब्द से
ज्योति खरे II सुबहमां की पीठ पर बनेकत्थई निशान परमलहम लगाती हैपूरे घर में बिखरीटूटी चूड़ियों...
कालिदास
भारत यायावर II कल अचानक कालिदास मिल गएएक कुल्हाड़ी कंधे पर रखे जंगल की ओर जा रहे थेमैंने उनके हाथ...
शून्यता को भरती तुम
संजय स्वतंत्र II तुम नहीं थीतब भी थी तुममेरी शून्यता मेंकई शून्य लेकर,तुम नहीं थी मगरतुम्हारे शब्द...
